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अपशब्दों पर उतरे ट्रम्प!*

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अपशब्दों पर उतरे ट्रम्प!*

*अपशब्दों पर उतरे ट्रम्प!*

अंग्रेज़ी की एक पुरानी कहावत है कि ‘मुझे बताओ कि तुम्हारे दोस्त कौन हैं और मैं तुम्हें बताऊंगा कि तुम कौन हो’, तात्पर्य यह कि हम जिस संगत में रहते हैं, उससे हमारे चरित्र का भी पता चलता है। हम नहीं जानते कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस विचार से कितना सहमत हैं। क्योंकि वे अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू दोनों को अपना क़रीबी मित्र बताते हैं। उनके साथ व्यवहार भी कूटनीतिक शिष्टाचार से परे जाकर करते हैं। नेतन्याहू तो पहले ही युद्ध अपराधी ठहराए जा चुके हैं। ट्रम्प उसी राह पर आगे बढ़ रहे हैं। डोनाल्ड ट्रम्प पर कभी कोई मुकदमा अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में दर्ज होगा या नहीं, कहा नहीं जा सकता। लेकिन इस समय उनकी भाषा में जो गिरावट स्पष्ट परिलक्षित है, कम से कम उसका ख्याल रखकर ही नरेन्द्र मोदी को उनसे दूरी बना लेनी चाहिए।

दरअसल ईरान पर अमेरिका और इजरायल को जंग छेड़े छह सप्ताह हो चुके हैं, जिसमें कई बार जीत का दावा करने के बावजूद डोनाल्ड ट्रम्प जीत के लक्षण नहीं दिखा पाए। बल्कि बार-बार युद्धविराम की अवधि को बदलते हैं और साथ ही उनकी धमकियां भी बदल रही हैं। ईरान में सत्ता परिवर्तन के ऐलान से शुरु हुआ यह युद्ध अब नागरिकों को निशाने पर लेने की धमकियों पर उतर आया है। रविवार को ईस्टर के मौके पर अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रूथ पर ट्रम्प ने ईरान को धमकी दी कि 48 घंटों में होर्मुज जलडमरूमध्य मार्ग खोलो वर्ना परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहो। ट्रम्प ने लिखा कि मंगलवार को ईरान के बिजली संयंत्रों और पुलों पर व्यापक हमले हो सकते हैं, और इसे संघर्ष का निर्णायक क्षण बताया। लेकिन यह सब इसी तरह की शालीन भाषा में नहीं लिखा गया, बल्कि उन्होंने अपशब्दों का इस्तेमाल किया। और यह पहली बार नहीं है कि ट्रम्प ने इस तरह सार्वजनिक तौर पर अपशब्द कहे हों। इससे पहले उन्हें पत्रकारों से चर्चा के दौरान या भाषण देते हुए भी अपशब्द बोलते देखा गया है। यह किसी लिहाज से स्वीकार्य नहीं होना चाहिए और वैश्विक नेताओं को खुलकर इसकी भर्त्सना करना चाहिए। नरेन्द्र मोदी से इसकी शुरुआत हो तो कितना अच्छा रहेगा।

वैसे संयुक्त राष्ट्र में ईरानी मिशन ने ट्रम्प की नवीनतम टिप्पणियों की निंदा करते हुए कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति ईरान में ‘नागरिकों के जीवन के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे को नष्ट करने’ की धमकी दे रहे हैं। मिशन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा, ‘यदि संयुक्त राष्ट्र की अंतरात्मा जीवित होती, तो वह युद्ध भड़काने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा नागरिक बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने की खुली और बेशर्म धमकी पर चुप नहीं रहती। ट्रम्प इस क्षेत्र को एक अंतहीन युद्ध में घसीटना चाहते हैं।’ इसमें कहा गया, ‘यह नागरिकों को आतंकित करने के लिए प्रत्यक्ष और सार्वजनिक उकसावा है और युद्ध अपराध करने के इरादे का स्पष्ट प्रमाण है।’ इसमें आगे कहा गया- ‘अंतरराष्ट्रीय समुदाय और सभी राज्यों का यह कानूनी दायित्व है कि वे युद्ध अपराधों के ऐसे जघन्य कृत्यों को रोकें। उन्हें अभी कार्रवाई करनी चाहिए। कल बहुत देर हो जाएगी।’  वहीं ईरानी संसद के अध्यक्ष ग़लिबाफ़ ने कहा कि ट्रम्प के ‘लापरवाह कदमों से अमेरिका के हर परिवार को एक जीते-जागते नरक में धकेला जा रहा है, हमारा पूरा क्षेत्र जल उठेगा क्योंकि आप नेतन्याहू के आदेशों का पालन करने पर अड़े हैं।’

ग़लिबाफ के इस बयान से असहमत होने का कोई कारण नहीं है, क्योंकि ट्रम्प जिस तरह अपने बयान बदल रहे हैं, उसमें यही लगता है कि पटकथा कोई और लिख रहा है, केवल संवाद अदायगी ट्रम्प की है। क्योंकि अपशब्द वाले बयान के बाद ट्रम्प ने फॉक्स न्यूज़ के एक पत्रकार से कहा, मुझे लगता है कि सोमवार को समझौता होने की अच्छी संभावना है, वे (ईरान) अभी बातचीत कर रहे हैं। तो ट्रम्प को लगता है कि ईरान अब भी उनसे बात कर समझौता करेगा, जबकि ईरान की सबसे बड़ी सैन्य कमांड यूनिट ख़ातम अल-अनबिया सेंट्रल हेडक्वार्टर के प्रवक्ता ने कहा, ‘अगर आम लोगों पर हमले दोहराए गए, तो हमारे अगले हमले और जवाबी कार्रवाई पहले से कहीं ज़्यादा ख़तरनाक और बड़े पैमाने पर होंगे।’ ध्यान देने वाली बात यह है कि ईरान केवल धमका नहीं रहा है, अपनी बात पर अमल भी कर रहा है। अमेरिका का साथ देने वाले खाड़ी देशों समेत इजरायल पर ईरान के हमलों को कोई रोक नहीं पा रहा है, वहीं अमेरिका के लड़ाकू विमानों पर हुए हमले और एक अमेरिकी पायलट के लापता होने की घटना ने भी ज़ाहिर कर दिया है कि अमेरिका उतना भी ताकतवर देश नहीं है, जितना बड़ा उसका हौव्वा खड़ा किया गया है। ईरान की पहाड़ियों में लापता पायलट को बचाने का दावा ट्रम्प ने किया है, हालांकि ईरान ने कहा है कि उसने बचाव के लिए आए सैन्य दस्ते पर भी हमला किया है। अब किसका दावा सही है और किसका ग़लत, यह तय नहीं किया जा सकता। लेकिन इतना तो नजर आ ही रहा है कि इस युद्ध में अमेरिका को वैसी ही चोट पड़ रही है, जो पहले इराक, अफगानिस्तान, क्यूबा और वियतनाम में पड़ चुकी है।

2019 में ट्रम्प ने खुद एक पोस्ट में प. एशिया में अमेरिका की सैन्य दखलंदाजी और युद्ध को गलत ठहराया था, क्योंकि उसमें अरबों डॉलर खर्च हुए और सैनिकों का नुक़सान हुआ। लेकिन अब संभवतः एपस्टीन फाइल्स के खुलासे के दबाव में ट्रम्प ने पूरी दुनिया को युद्ध की बर्बादी में झोंक दिया है। अपनी गलती मानने की जगह रोज़ाना बेतुके, निर्लज्ज बयानों से उसे सही भी ठहरा रहे हैं। ईरान में परमाणु हथियार और सत्ता बदलने के नाम पर शुरु किया गया युद्ध मीनाब की मासूम बच्चियों का क़ातिल बना और उसके बाद ईरान की अधोसंरचना पर हमले ही किए जा रहे हैं, कम से कम 30 विश्वविद्यालयों और कई अस्पतालों, दवा कारखानों को ध्वस्त कर दिया गया है। यह सीधे-सीधे मानवता के ख़िलाफ़ अपराध है, जिसे रोकने के लिए वैश्विक समुदाय को मिलकर आवाज़ उठानी चाहिए। यह बात आज बाबूजी सुशील कुमार सरावगी जिंदल ने महाराष्ट्र प्रदेश प्रवास पर जाते हुए अपने उद्बोधन में बताई। बाबूजी ने स्पष्ट रूप बताया कि सब अपना बर्चस्व कायम रखना चाहते है शास्त्रों को खपाने की होड़ लगी हैं। लगता हैं जल्दी विश्व का भूगोल बदल जाएगा। यह भी तय है हिंदुस्तान पर कोई भी दबाव नहीं सोच सकता। भारत चीन रूस को एक होकर यह महायुद्ध को विराम देना होगा।11 अप्रैल शनिवार,2026

डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी राष्ट्रीय विचार मंच नई दिल्ली से जुड़ने के लिए संपर्क करे

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